समुद्र मंथन की आवश्यकता क्यों पड़ी

Pracheen gyanदोस्तों आप सभी को पता है समुद्र मंथन की आवश्यकता क्यों पड़ी एक बार महर्षि दुर्वासा एक जंगल में विचरण कर रहे थे वहां पर एक ऐसा हो विद्याधर घूम रहा था उसके गले में एक सुगंधित पुष्पों की माला पड़ी हुई थी और सुगंधित पुष्पों की माला को महर्षि दुर्वासा मांग लेते हैं उसी समय हुआ इंदिरा जाता है इंद्र को भी प्रसन्नता हुई और इंद्र ने ऋषि दुर्वासा से वह पुष्पों की माला मांग ली महर्षि ने वह पुष्पों की माला इंद्र को दे दी इंद्र को उसकी खुशबू पसंद नहीं आई उसने उसे एरावत हाथी के गले में डाल दिया ऐरावत हाथी ने कुछ एक समय पश्चात अपनी छोड़ के द्वारा उतार कर फेंक दिया इस प्रकार वहां ऋषि दुर्वासा आए और वह क्रोधित हो गए उन्होंने इंद्र को श्राप दे दिया और कहा किरे मत मत जा तू थोड़े ही समय में तेरा यह घमंड जाता रहेगा इंद्र ने दुर्वासा से खूब प्रार्थना की परंतु दुर्वासा नहीं माने और इसके पश्चात देवों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया जिसमें देवताओं की हार हो गई देवताओं ने पुकारा ब्रह्मा जी को ब्रह्मा जी उन्हें विष्णु भगवान के पास ले गए भगवान विष्णु ने कहा अब तुम स्वर्ग के समस्त देवताओं को लेकर और दैत्यों को अपने साथकिसी भी प्रकार से हिमालय पर्वत की समस्त औषधियों को लाकर समुद्र में डाल दो और मिलकर के समुद्र मंथन करो दोस्तों ऐसा ही करना पड़ा भगवान शिव के आदेशानुसार शेषनाग को बना लिया गया नीति और मद्रा चल पर्वत को मथानी बनाकर समुद्र को मत डाला इस प्रकार उसमें से 14 रत्न निकले

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