अमरीश के यज्ञ से दुर्वासा ऋषि क्यों भटक रहे थे दौरान

 दोस्तों नमस्कार

एक बार महाराज अमरीश ने यज्ञ किया था। महर्षि दुर्वासा मुख्य अतिथि थे। दुर्वासा पहुंच जाते हैं यज्ञ में। दूसरे दिन यज्ञ में आहुति दी जानी थी। परंतु प्रातः काल ही महर्षि दुर्वासा भ्रमण के लिए सरयू नदी पर चले गए। तब तक यज्ञ का कार्य पूरा हो चुका था। और ब्राह्मणों का भोजन बकाया था। परंतु मुख्य अतिथि के बिना भोजन किस प्रकार प्रारंभ किया जाए।



इस बात से महाराज अमरीश परेशान थे। तभी एक ब्राह्मण ने महाराज अमरीश को सलाह दी। आप महर्षि दुर्वासा का भाग निकालकर अलग रख दें। और भोजन प्रारंभ करवाएं। ऐसा सोच कर के यह उचित सलाह है तो महाराज ने ब्राह्मणों को भोजन करवाना प्रारंभ कर दिया। जैसी भोजन प्रारंभ हुआ उसी समय महर्षि दुर्वासा आ गए।


महर्षि दुर्वासा को यह बात अच्छी नहीं लगी उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया। दोस्तों महर्षि दुर्वासा भगवान विष्णु के अंश से ही उत्पन्न हुए थे। इस कारण उन्होंने अपनी एक जटा को काटकर जमीन में दे मारा। उस जटा से कृत्या नाम की राक्षसी उत्पन्न हो गई। वह महाराज अमरीश को मार ने दौड़ी।


महाराज अमरीश ने अपनी रक्षा के लिए भगवान श्री हरि विष्णु को पुकारा। भगवान श्री हरि विष्णु ने अमरीश की प्रार्थना सुन ली और अपने सुदर्शन चक्र को छोड़ दिया। सुदर्शन चक्र ने कृत्या को समाप्त कर दिया। और अब तो सुदर्शन दुर्वासा के पीछे पड़ गए। दुर्वासा ऋषि सुदर्शन के भय के कारण तीनों लोकों में घूमते रहे परंतु उसका पीछा सुदर्शन ने नहीं छोड़ा। दुर्वासा जहां भी जाते वहा ने अपने पीछे सुदर्शन दिखाई देता।


जब भगवान श्रीराम ने 11000 वर्ष तक राज्य किया। तब ऋषि दुर्वासा भगवान श्री हरि विष्णु के पास गए और कहने लगे कि मुझे प्रभु क्षमा कर दो। भगवान श्री हरि विष्णु ने कहा पृथ्वी लोक पर हमारे अवतार श्रीराम है आप उनके पास जाइए।


इस प्रकार जब भगवान श्री राम सोच रहे थे आओ मेरा समय हो गया है मैं मेरे धाम जाना चाहता हूं तो उससे पहले ऋषि दुर्वासा के आश्रम पर भगवान श्री राम पहुंचे भगवान श्रीराम से प्रार्थना की और कहां हे प्रभु आप घर को जब जाना पहले मुझे विदा कर जाना

इस बात का मतलब यह था। महर्षि दुर्वासा ने ना जाने कितने वर्षों से भोजन नहीं किया था क्योंकि उनके पीछे सुदर्शन जो पढ़ा हुआ था इसलिए भगवान श्रीराम ने सुदर्शन से कहा कि आप दुर्वासा के कहे अनुसार अमरीश के पास जाओ और दुर्वासा भी वहां पहुंच जाते हैं दुर्वासा कहते हैं कि आपके कहने से ही यह सुदर्शन शांत हो सकते हैं तो अमरीश ने कहा यदि ऐसा है तो मैं सुदर्शन से कहता हूं हे प्रभु सुदर्शन यदि आप मेरा कहना मानते हैं तो इस ऋषि का पीछा छोड़ दें दोस्तों सुदर्शन ने ऋषि का पीछा छोड़ दिया और शांत हो गए।


ऋषि कोसी यज्ञ के समय के से ही भूखे थे। फिर भगवान श्रीराम ने ऋषि को भोजन कराया और उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर उनकी कुटिया से सरयू की तरफ चले गए।


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