क्यों दिया स्त्री जाति को युधिष्ठिर ने श्राप कि तुम्हारे पेट में कोई बात नहीं गिरेगी

 नमस्कार दोस्तों,

आप सभी को ज्ञात है। कर्ण माता कुंती का जेष्ठ पुत्र था। यह इन्होंने सूर्य देव की कृपा से क्वारेपन में ही पैदा किया था। इस कारण से कर्ण को माता कुंती ने एक बक्सा से में बंद करके यमुना में बहा दिया था। जहां पर अधिरथ और उसकी पत्नी राधा स्नान कर रहे थे। दोनों ने बक्से को निकाला। और खोल कर देखा कि उसमें एक बालक जीवित अवस्था में सोया हुआ है।


अदिरथ के कोई संतान नहीं थी इस कारण से उसकी पत्नी राधा ने उसका लालन-पालन किया। कर्ण बडा हो गया। लेकिन बचपन से ही क्षत्रिय पानी के गुण थे इस कारण व शांत ना रह सका और कौरव पांडवों में जाकर के ही रहने लगा।

वह साहसी और वीर योद्धा था। इस कारण राजकुमारों के क्षेत्र में भी दखलअंदाजी करता था। कई बार गुरु द्रोणाचार्य ने भी उसे टोका लेकिन वह किसी से डरता नहीं था क्योंकि वह महारथी था। जब रंगशाला मैं अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य द्वारा प्रतियोगिता करवाई गई तो उसमें दुर्योधन की प्राण रक्षा बाण मारकर के अर्जुन के बाण का प्रत्युत्तर दिया था।

दुर्योधन उसकी वीरता से प्रसन्न हुआ और उसे अंग देश का राजा बना दिया। कर्ण ने पांचाली के स्वयंवर में भी उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर मछली की आंख को बींद दिया था। परंतु पांचाली ने मना कर दिया था कि मैं सूत पुत्र के साथ विवाह नहीं करना चाहती।


समय गुजरता रहा महाभारत का युद्ध हुआ उस युद्ध में करण ने खूब मनमानी की। परंतु अर्जुन के हाथों मारा गया तो माता कुंती युद्ध भूमि में पहुंचकर करण के पास बैठकर रोने लगी तो रोने का कारण पूछा। तो माता कुंती ने बताया यह तुम्हारा जेष्ठ भ्राता था। इस बात से नाराज होकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि तुमने इतने बड़े सत्य को हमसे छुपाया है किसी से तो कहा होता तो हमें पता होता कि कर्ण हमारा भाई है।


ऐसा कहते हुए धर्मराज क्रोधित होते हैं और कहते हैं कि मैं स्त्री जाति को श्राप देता हूं आज से स्त्रियों के पेट में कोई भी बात नहीं पच पाएगी। वह किसी ना किसी से अवश्य से कह देगी।


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