गिरिराज महाराज को क्यों लगा जमीन में धंसने का श्राप

 दोस्तों नमस्कार

दोस्तों जब भगवान श्री राम नल नील के द्वारा समुद्र पर सेतु बनाने का कार्य करवा रहे थे। तो सभी वानर सामग्री के रूप में पत्थर पर्वत आदि उठा उठा कर ला रहे थे। इसी बीच हनुमान जी हिमालय पर्वत पर पहुंच जाते हैं।


और वहां से श्री गोवर्धन महाराज को उठाकर ले जाने के लिए इन से प्रार्थना करने लगते हैं। और कहने लगे मैं तुम्हें भगवान श्री राम के दर्शन कराऊंगा यदि आप मेरे साथ चलें तो, इस प्रकार हनुमान जी इनको उठाकर ला रहे थे।


रास्ते में हनुमान जी को सूचना मिली कि सेतु का कार्य पूर्ण हो चुका है। हनुमान जी गोवर्धन महाराज को पटक कर चलने लगे तो गोवर्धन महाराज कहने लगे आपने तो मुझसे भगवान श्री राम के दर्शन कराने का वायदा किया था।

आप मुझे या तो भगवान के दर्शन कराइए नहीं तो मैं आपको श्राप दे दूंगा। हनुमान जी कहने लगे मैं प्रभु श्रीराम से पूछ कर आता हूं हनुमान जी पहुंच जाते हैं भगवान श्री राम के पास और कहते हैं प्रभु मैं इस तरह से एक पर्वत को उठा कर ला रहा था लेकिन मैंने सुन लिया कि से तू का कार्य पूर्ण हो चुका है।

इस कारण उस पर्वत को मैंने यहां लाना उचित नहीं समझा अब वह आपके दर्शन करने के लिए कह रहा है। भगवान श्री राम कहने लगे उनसे कह दो द्वापर युग में हमारा कृष्णावतार होगा उस समय हम अपनी गाय उसी पर्वत पर चलाएंगे और उसे अपनी उंगली पर धारण करेंगे।

हनुमान जी जाकर के गोवर्धन महाराज से कह देते हैं और गोवर्धन महाराज खुशी से अपने नियत स्थान पर युगों तक पड़ रहे। इस बात का पता उनके पिता हिमाचल को चला तो वे अपने पुत्र को लेने बृजधाम आ पहुंचे परंतु श्री गिरिराज महाराज ने मना कर दिया इस पर कुपित पिता ने अपने पुत्र को श्राप दे दिया और कहां तुझे आना तो हमारे यहां पर ही पड़ेगा परंतु तू जमीन में कलयुग में होने वाले पापों से तिल २ धंस करके आएगा।

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