अग्नि जल वायु और इनमें से कौन बड़ा है

 दोस्तों नमस्कार

एक बार भगवान नारायण समस्त देवताओं की परीक्षा लेना चाहा। उस समय सभी देवता अपने अपने को बड़ा समझ रहे थे। कोई किसी का कहना नहीं मान रहा था। इंद्र से अग्निदेव कहने लगे मैं तुमसे अधिक बलवान हूं मैं चाहूं तो तुम्हें जला दूं इसलिए मैं राजा हूं स्वर्ग का मैं तुम्हारा आदेश नहीं मानता। इसी प्रकार वरुण देव और वायु देव इन्होंने भी कह दिया।


इंद्रो समय परेशान हो गया सोचने लगा हे दीनानाथ यह सभी देवता मेरा कहना नहीं मानते हैं अब मैं मेरा राज किस प्रकार चलाओ। इंद्र की प्रार्थना सुनकर नारायण भगवान ने अपना औघड़ रूप बनाया और औघड बनाकर के पहुंच जाते हैं एक ऐसे स्थान पर जोगेश्वर के समीप ही था वहां बैठकर अपनी माया से वर्षा करने लगे।


जब इस बात का पता वरुण देव को चला तो वरुण देव सोचने लगे, के बरसात अपने आप कैसे हो गई तो उसी औघड़ के पास आ जाते हैं अगर पूछता है आप कौन हो इस पर वरुण देव अपना परिचय देता है और कहता है मेरा नाम वरुण है मैं चाहूं तो समस्त ब्रह्मांड में जल ही जल की बरसात कर दूं और समस्त कचरे को बहाकर गंदगी को साफ कर सकता हूं। ओगड़ भेषधारी प्रभु कहने लगे । लो यह तिनका भी रख रहा हूं। तुम इस तृण को बहा दो। यह आदेश सुनकर वरुण देव ने अपना संपूर्ण जोर लगाया परंतु उस तृण को नहीं वह आ सके। अपना सा मुंह लेकर जल्दी वापस चले जाते हैं।


इसके पश्चात जोर-जोर से वायु बहने लगी तो पवन देव सोचने लगते हैं कि मैंने तो भाइयों को इस प्रकार बहने से मना कर रखा था यह भाइयों क्यों बहने लगी है। पवन देव को पता चलता है कि यह समस्त कार्य औघड महात्मा का है। पहुंच जाता है उसके पास में और चुपचाप खड़ा हो जाता है। उसे अपने पास खड़ा देखकर महात्मा कहने लगा आपका क्या नाम है तो वायु देव ने कहा मेरा नाम वायु है। मेरी ताकत बहुत अधिक है मैं चाहूं तो बड़े-बड़े पर्वतों को उड़ा सकता हूं और इस पृथ्वी से समस्त गंदगी को उड़ा ले जा सकता हूं। यह सुनकर उस महात्मा ने उसी तिनके को वायु देव के समक्ष रख दिया।


वायु देव ने उस दिन के को उड़ाने के लिए अपनी संपूर्ण ताकत को लगा दिया लेकिन वतन का हिली ना सका। अपना समूह लिए वायु से वापस चले जाते हैं।


इसके पश्चात अग्नि देव अपने में अग्नि को समेटे हुए थे उसी समय अग्नि जलने लगी अग्नि को जलता देख अग्निदेव देखने लगे मैं तो अग्नि को मेरे में समाहित करके बैठा हूं यह अग्नि कहां से चल रही है। यह देख कर उसी महात्मा के पास अग्निदेव आ जाते हैं और अपना नाम अग्नि बताते हैं यह सुनकर महात्मा ने उसी तिनके को रख दिया। और कहां लो तिनके के को जला दो। अग्निदेव ने तिनके को जलाने के लिए आपने संपूर्ण ताकत को लगा लिया लेकिन उसे नहीं जला पाया।


अग्निदेव वापस चले जाते हैं। तत्पश्चात इन्द्र आ जाते हैं और देखते हैं के साधु रूप धारी कौन है। तो इंद्र ने उन्हें जानने के लिए खूब जिज्ञासा की परंतु उन्हें पहचान नहीं सके। जाओ महात्मा अंतर्ध्यान हो गए तो इंद्र को पता चला कि यह और कोई नहीं यह तो स्वयं श्री नारायण है। इंद्र ने कहा हे प्रभु मैंने आपको पहचान लिया है तो आकाशवाणी होती है और प्रभु कहने लगे कि तुम सभी का राजा इंद्र होगा उसने मुझे सबसे पहले पहचाना है और आप समस्त देवता इनका आदेश मानेंगे।

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