रंभा को दुर्वासा का श्राप। वनना पड़ा घोड़ी


 दोस्तों नमस्कार।

एक बार इंद्र की अप्सरा जिसका नाम रंभा था। जल क्रीड़ा करने के लिए सरयू नदी पर आ गई। जहां पर ऋषि दुर्वासा तपस्या कर रहे थे। दुर्वासा ऋषि की तपस्या में विघ्न हो रहा था। इस कारण वे से खड़े होकर आए। कहने लगे हे भाई आप कौन हो यहां पर ऋषि मुनि तपस्या करते हैं ,इतना शोर बोलना करो। परंतु रंभा हंसने लग जाती है। और कहती है आए घोड़े जैसी चाल चलकर मुझ से मना करने। ऐसा कहकर उस जल में और अधिक शोरगुल करते हुए जल क्रीड़ा करने लगी।


ऋषि ने अपना अपमान समझकर क्रोधित होकर रंबा को श्राप दे दिया और कहां जाओ आप घोड़ी बन जाओ। ऐसा कहने पर रंभा घोड़ी बन जाती है। यह सब देख कर देवराज इंद्र आ गए। कहने लगे हे मुनिवर। आपने यह क्या किया। आप अपना सर आप वापस ले लो या इसका उद्धार वताओ। ऋषि दुर्वासा कहने लगे देवराज। आप जानते हैं ऋषि मुनियों के श्राप कभी भी व्यर्थ नहीं जाते।

इसका केवल एक उपाय है यदि मनुष्य और देवताओं में युद्ध हो जाए तो यह फिर से अप्सरा हो सकती है। जहां पर 3 वज्र खड़ हो जाएं। ताबिश का उद्धार होगा। इंद्र रंभा को लेकर भगवान कृष्ण के पास में जाते हैं और कहते हैं प्रभु इसका उदाहरण कैसे होगा बल्ला कहीं मनुष्य और देवताओं में युद्ध हो सकता है। भगवान कृष्ण कहने लगे हां हो सकता है युद्ध तो मैं करा दूंगा। दोस्तों भगवान श्रीकृष ने। घोड़ी के गले में चुनौती भरा पत्र लिखकर लटका दिया।


घोड़ी देश विदेश घूमने लगी। और अंत में राजा धंग के राज्य में पहुंच जाती है। राजा धन घोड़ी को पकड़ लेता है। परंतु पत्र को पढ़कर रोने लगता है। इस प्रकार घोड़ी को लेकर अपने राज्य को छोड़कर निकल जाता है। हसनापुर में आकर यमुना के किनारे बैठकर रोने लगता है। द्रौपदी जल भरने आती है। और उससे रोने का कारण पूछती है। राजा सारी कथा सुना देता है।

द्रोपदी उसे हस्तिनापुर ले आती है। जब भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलता है पांडवों से युद्ध करने के लिए तैयार हो जाते हैं। उस समय हसनापुर राज्य एक ही था इस कारण उस युद्ध में कौरवों ने भी साथ दिया। भगवान कृष्ण हार मान लेते हैं और रंबा फिर से अप्सरा हो जाती है।


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