हंस और उल्लू की कहानी से बर्तमान पंच प्रतिनिधियों पर पर व्यंग।


मित्रों नमस्कार
एक बार एक हंस और हंसिनी का जोड़ा था। ग्रीष्म काल का समय था। हंसों का दाना पानी सूख चुका था। इस कारण हंस और हंसिनी दोनों सोचने लगे कि चलो कहीं दूसरे समुद्र में उड़कर चलते हैं। हंस और हंसिनी जब उड़ते उड़ते दूसरे समुद्र में जा रहे थे। तो उन्हें रात्रि हो जाती है। हंस कहता है। अब रात में उठकर चलना ठीक नहीं है इसलिए हम इस गांव के समीप इस बड़े से वृक्ष पर ठहर जाते हैं।

इस प्रकार हंस और हंसिनी दोनों उस गांव के समीप एक पीपल के वृक्ष पर ठहर जाते हैं। वह गांव खेड़े से नीचे उतर कर बस गया था। और खेड़ा सुनसान पड़ा था। इस प्रकार जो प्रातः काल होने से पहले हंस और हंसिनी ने देखा कि बहुत बड़ा मिट्टी का ढेर खेड़ा बना पड़ा है। हंस कहने लगा हंसिनी यह खेड़ा उजड कैसे  गया।
तभी उल्लू आया। और वह वहां आकर के अपनी कर्कश बली में बोलने लगा। उल्लू की आवाज को सुनकर हंस पुन हंसिनी से कहने लगा। देखो हंसिनी। यह खेड़ा ऊजड इस उल्लू के बोलने के कारण हुआ है।



उल्लू पास में ही बैठा था दूसरी डाल पर,और सब कुछ सुन रहा था। उल्लू कहने लगा ठीक है। यह दोनों पत्नी पति मुझे दोषी बना रहे हैं मेरी कर्कश बोली है। जो भगवान की देन है। मैं लोगों को इस तरह नहीं जाने दूंगा।



उल्लू उनके जाने से पहले रात्रि में ही गांव में गया और गांव के लोगों को सारा हाल सुनाया कहने लगा सभी पंच मिलकर के चलो और वह जो दो हंसिनी और हंस बैठे हैं उन पर चल के कोई दंड दे दो। और उनसे पूछो मैंने इस तरह बोलकर इस खेड़े को कौन सा नुकसान पहुंचा दिया।



गांव के समस्त पंच पटेल पहुंच जाते हैं पीपल के वृक्ष के पास हंस और हंसिनी के रवाना होने से पहले, कहने लगे ओ परदेसी जाने से पहले यह बताइए। कि हमारे इस उल्लू के बोलने से यह खेड़ा कैसे उजड़ हो गया। हंस कहने लगा भाई उल्लू के बोलने से बस्ती उजड़ हो जाती है यह बुजुर्ग लोग कहते आए हैं क्या आपको नहीं पता है।


यह सुनकर पंच कहने लगे भला किसी के बोलने से बस्ती उजड़ होती होगी। यह तो तुमने सीधे व्यक्ति पर दोष लगाया है इसके लिए समस्त पंचायत तुम पर कोई ना कोई जुर्माना करेगी। हंस कहने लगा भैया हम तो विदेशी हैं पर ठीक है तुम्हारी पंचायत हम पर जुर्माना करेगी वह हमें मंजूर होगा।



उस गांव के समस्त पंचों ने मिलकर हंस को दंड दिया यह जो तुम्हारी पत्नी है इसे तुम हमारे उल्लू के लिए छोड़ दो। उल्लू यशवंत कर प्रसन्न हो गया और कहने लगा हमारे यहां की बहुत अच्छी पंचायत है मुझे पत्नी मिल गई मेरा विवाह हो गया।


हंस जाने से पहले रोने लगा। उल्लू कहने लगा अब क्यों रो रहे हो कहने लगा भाई मेरी पत्नी रह गई। यह सुनकर उल्लू कहने लगा अब तो किसी पर दोषारोपण नहीं करोगे। अब उल्लू खड़ा होकर कहने लगा पंचों से के जाने से पहले आप सभी सुन लो। हंस ने ठीक कहा है कि यह खेड़ा उजड़ है परंतु यह मेरे बोलने से नहीं हुआ उजड़। यह तो इन पंचों के कारण हुआ है। जो इस तरह का फैसला देते हैं। भला एक हंसिनी कहीं एक उल्लू की पत्नी हो सकती है। उल्लू उसके लिए क्या खिला सकता है क्या पिला सकता है।



उल्लू तो उल्लू ही होता है हंसिनी समुद्र में मोती चुभती है देखो पंच पटेलों की बातें बेचरे परदेसी की पत्नी। और मेरे लिए दे दी है। ऐसा कहकर उल्लू ने कहा भाई तुम तुम्हारी पत्नी को साथ ले जाओ मैं इसके लिए कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि यह तो समुद्र में रहने वाली है मोती चुगने वाली है मेरे यहां क्या है।

शिक्षा-वर्तमान के पंच पटेलों के न्याय के बजाय तो खुद बैठकर न्याय करने वह अच्छा होता है।

टिप्पणियाँ